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Short story (लघु कथा) – सुरक्षा [ In Hindi ]

सुबह का वक्त था। चूँकि वो जल्दी उठ गया था एवं ऑफिस जाने के लिए तैयार था, सो कुछ देर अख़बार देखने के मानस से उसने अखबार उठाया। शुरूआती खबरों में ज्यादातर खबरें राजनीति से जुडी थी, पर उसे इनमे कोई दिलचस्पी नहीं थी।

“शीतल, नाश्ते में कितना टाइम है?” – उसने अपनी पत्नी से पूछा।

“जी बस दो मिनट। अभी लाई।” – पत्नी ने किचन से जवाब दिया।

कुछ सोचते हुए उसने वापस अखबार की और रुख किया और पृष्ठ पलटने को ही था कि एक खबर ने उसका ध्यान अपनी और खींचा।

खबर थी – “दो वर्ष की बच्ची के साथ बलात्कार। आरोपी गिरफ़्तार।”

आये दिन ऐसी खबरें पढ़ने को मिलना आम बात हो गयी थी।

“क्या जमाना आ गया है?” – उसने धीरे से चिंतित स्वर में कहा।

उसे ऐसा देख कर शीतल, जो की नाश्ते की थाली ले कर आयी थी ने पूछा – “क्या हुआ? सब ठीक तो है?”

“कुछ भी ठीक नहीं है। ये देखो, लगातार तीन दिनों से ऐसी खबरें पढ़ने को मिल रही हैं।” – अखबार में खबर की और इशारा करते हुए उसने दुःख एवं गुस्से भरे लहजे में कहा।

“मैं समझ सकती हूँ। बच्चियों की मासूमियत, उनके बचपन को देखकर भी ऐसे कृत्य करने वालो को दया नहीं आती है।” – शीतल ने अखबार में खबर की हैडलाइन पढ़ कर कहा।

“छी, कितनी ओछी मानसिकता होती है ऐसे लोगो की। ऐसे लोगों को तो त्वरित सुनवाई करते हुए फांसी की सजा दे देनी चाहिए।” – उसने कहा और कुछ सोचने लगा।

“हम बस इस विषय पर वाद-विवाद कर सकते हैं। हमारे हाथ में कुछ नहीं है। महिलाएं खुद को सुरक्षित रखने की कोशिश कर सकती हैं, और कुछ नहीं।” – शीतल ने हताशा से जवाब दिया।

यह बातें चल रही थी, तभी अंदर के कमरे से उनकी एक साल की बच्ची के रोने की आवाज़ आयी। शीतल फ़ौरन कमरे में गई और बच्ची को संभाला। उसे गोद में लिया और पुचकारा।

खुद को माँ की गोद में पा कर बच्ची ने रोना बंद कर दिया और चुप हो गई। कुछ ही देर में बच्ची ने आँखें बंद कर ली और वापस सो गई। कहते हैं कि एक बच्चा खुद को माँ की मौजूदगी में सबसे सुरक्षित महसूस करता है। तभी वो नींद टूटने पर खुद को अकेला पा कर रोने लगता है, और जब माँ सिरहाने बैठी हो तो सुकून से सो जाता है।

बच्ची को वापस पलंग पर सुला कर शीतल कुछ देर वहीं बैठ गयी।

तभी वो कमरे में आया और पलंग पर सोती हुयी बच्ची के सिर पर हाथ फेरा।

“शीतल, महिलाएं तो खुद की सुरक्षा का प्रयास कर सकती हैं, पर इन बच्चियों का क्या?” – उसने कहा।

“ये काम हम माता-पिता का है।” – शीतल ने जवाब दिया।

उसने एक पल बच्ची की तरफ देखा और कहा – “हाँ। ये हमारी नन्ही परी है। हम अपनी लाडो पर किसी का बुरा साया भी नहीं पड़ने देंगे। पर….”

“पर?” – शीतल ने पूछा।

“वो वक्त कब आएगा, जब हमारी बहनें और बेटियां पूर्ण रूप से सुरक्षित होंगी, बेफिक्र हो कर घर से निकल सकेंगी? ” – उसने शीतल की ओर देखते हुए धीरे से कहा।

उसके इस सवाल का जवाब शीतल के पास नहीं था।

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Written by: Ankit Singh, Chief Blogger, TULRAC

Note: This short story is entirely a work of fiction, and has no relation with the author’s life and/or any one related to them.

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