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[Poetry] सर्द रात और रोशन जहान

Poetry: सर्द रात और रोशन जहान
Written by: अंकित सिंह गहलोत
सर्द रात में छत पर टहलते हुए..
गर्म कपड़ो से पूरी तरह लैस हुए..
उसकी निगाहें..
बरबस.. दुर एक कोने पर जा रही है..
उस झोपड़ी पर, जहां से मध्दिम रोशनी आ रही है..
उस रोशन आशियाने को देखते हुए जब
वो चारों तरफ नजर दौड़ाता है..
कहीं बड़ी बड़ी इमारतें देखता है..
तो कहीं भव्य महलनुमा मकान देखता है..
पर इन सबके बीच..
वो कुछ अलग सा देखने लगता है..
कुछ अलग सा महसूस करने लगता है..
इन बड़ी बड़ी इमारतों के बीच..
वो रोशन झोपड़ी इस जहान को कुछ कुछ रोशन कर रही है..
इससे रोशन इन इमारतों की दीवारों भी हो रही है..
इस रोशनी से रोशन ये झोपड़ी में जो लोग हैं..
रह यहां अपने श्रम से एक इमारत की नींव रख रहे हैं..
इन भव्य इमारतों में जल्द ही शुमार ये इमारत होगी..
बस कुछ दिन और, फिर ये झोपड़ी भी गायब होगी..
ये श्रमिक भी फिर चले जायेंगे रोजी के लिए कहीं और
और फिर कुछ कुछ रोशन होगा एक जहान कहीं और..
फिर कहीं कोई “अंकित” किसी सर्द रात में छत पर टहलते हुए विचारण करेगा..
फिर कोई अपने मन के भावों को पेन से पेपर पर उकेरेगा..
Written by: Ankit Singh Gehlot
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