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बच्चियों एवं महिलाओं पर बढ़ते अपराध

आए दिन खबरों में देखने को मिलता है कि कहीं किसी जगह पर किसी महिला या बच्ची से बलात्कार हुआ है। कहीं सामूहिक बलात्कार तो कहीं बलात्कार के बाद हत्या जैसी खबरें भी मिलती हैं। महिलाओं एवं बच्चियों के विरुद्ध अपराधों के बढ़ते मामले बेहद चिंता का विषय है। वो भी एक ऐसे समाज में जिसे हम तकनीकी रूप से विकसित एक श्रेष्ठ समाज कहलाया जाना पसंद करते हैं। वस्तुतः श्रेष्ठ समाज वो समाज है जहाँ सभी सदस्य प्रेमआपसी सहयोग एवं सौहार्द से एवं बेख़ौफ़ होकर रहते हैं।

श्रेष्ठ समाज के निर्माण में नैतिकता एक बहुत ही जरुरी तत्व है। नैतिकता एक ऐसा तत्व है जिसे मनुष्य स्वंय अपने में रोपित कर सकता हैभले ही अच्छे साहित्य से इसका अर्जन किया जाये या फिर बड़ेबुजुर्गों से उनके अनुभव जान कर एवं उनकी सीखों को अपनी ज़िन्दगी में अपना कर। नैतिकता एक बहुत जरुरी तत्व है एवं एक नैतिकता से परिपूर्ण इंसान श्रेष्ठ इंसान कहलाता है।

एक श्रेष्ठ समाज में उस समाज का हर सदस्य निर्भीक और बेख़ौफ़ हो कर रहता है।

क्या आज के इस अपराध के माहौल में ऐसा संभव है?

अपराध दरजिसमे की महिलाओं के विरुद्ध अपराध मुख्य रूप से ध्यान देने योग्य हैका निरंतर बढ़ना एक संकेत है कि हमें इस और भी ध्यान देना चाहिए। नैतिक शिक्षा को बढ़ावा एवं बाल्यकाल से ही बच्चों को गुड टच – बेड टच इत्यादि का ज्ञान देना बहुत जरुरी है। साथ ही मातापिता को चाहिए कि वो अपने बच्चों से फ्रेंडली हो कर बात करेंजिससे की किसी अपराध के पहले की खतरे की घंटी का आभास करके अपराध को घटित होने से रोका जा सके। जुलाई 2018 में पारित आपराधिक कानून (संशोधनविधेयक– 2018 के अनुसार अब 12 वर्ष से कम आयु की किसी बच्ची से रेप की स्थिति में अधिकतम सजा में मौत की सजा का प्रावधान किया गया है। इस तरह के मामलो में जाँच अधिकतम दो माह में पूरी कर ली जाएगी।

हाल ही सुर्ख़ियों में रहे मीटू अभियान में किये गए खुलासों से एक बात साफ़ है कि हर कार्यालय या कंपनी के दफ्तर में एक शिकायत कमेटी वक़्त की जरुरत है। इस बाबत महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (निवारण,प्रतिषेध और प्रतितोषअधिनियम 2013 बनाया जा चूका है जिसके अनुसार हर दफ्तर या कंपनी जिसमे 10 या अधिक कर्मचारी कार्य करते हैंउन्हें अनिवार्य रूप से एक शिकायत कमेटी का गठन करना चाहिए। फिक्की (FICCI)की 2015 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार 36% कंपनीयों ने पूर्ण रूप से इस कानून पर अमल नहीं किया है। गौरतलब है की इस अधिनियम के आने के बाद 2013 से 2016 के बीच इस तरह की शिकायतों में निरंतर इजाफा हुआ है (स्रोतFICCI-EY रिपोर्ट)

अंत में बस इतना ही कहना चाहूंगा की अपराध कारित होने से पहले की किसी खतरे की घंटी को अनदेखा न करेंआपकी एक समझदारी किसी अपने को अपराध का शिकार होने से बचा सकती है। अपराध हो जाने की दशा में पुलिस एवं कानून की मदद लें। इस तरह के मामलों में चुप न बैठे। ये हमेशा याद रखें कि यदि पीड़ित लोकलाजशर्म से सामने आ कर केस दर्ज नहीं कराती हैं तो अपराधी निर्भीक हो कर किसी अन्य महिला या बच्ची को शिकार बनाएगा। डर कर नहीं डट कर सामना करें।

आयेंसब मिलकर एक आदर्श समाज का निर्माण करें जहाँ किसी महिला या बच्ची अपराध से पीड़ित न हों। एक ऐसा आदर्श समाज एक ऐसा आदर्श देश बनाएं जहाँ सभी महिलाएं बेख़ौफ़ हो कर जी सकें। जय हिन्द।

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