Poetry

आज मेरे ख्वाबों ने फिर से साजिश की…

आज मेरे ख्वाबों ने फिर से साजिश की।
तुम्हे ख्वाबों में फिर बुलाने की कोशिश की।
तुम तो फैसला कर चुके हो कब का, न लौटने का।
पर दिल को शायद अब भी इंतजार है तुम्हारे आने का।
ये दिल ही तो है जो ख्वाब संजोता है।
ये दिल ही है जो फिर चोट खाता है।
तरसता है तड़पता है फिर वापस उसी और चलता है।
सुन ए दिल मेरे, ये कौन है जो उस दिशा में बसता है।
मेरा दिल बहुत हौले से यह कहता है।
सुनो अपने मन की, वो क्या कहता है?
मन और दिल के बीच मे पिसते पिसते।
अचानक दिमाग लग गया कहने।
मन और दिल को तुम छोड़कर।
अब चलो मेरा हाथ पकड़कर।
मेरे साथ रहोगे तो तकलीफ नहीं होगी।
और अच्छे से खुशहाल जियोगे।
मन-दिल और अब दिमाग के अंतर्द्वंद में।
जो थक हार कर थकान में चूर हुआ मैं।
पता ही नहीं चला कब निद्रा में चला गया मैं।
निद्रा में जो खोया, दिमाग और मन को कुछ राहत मिली।
दिल फिर भी बेचैन था जो उसे एक युक्ति सूझी।
दिल और ख्वाबों ने एक हो कर रणनीति बुनी।
और फिर..
आज मेरे ख्वाबों ने फिर से साजिश की।
तुम्हे ख्वाबों में फिर बुलाने की कोशिश की।


Note: This poetry was written by me (Ankit Singh), as a result to a writing prompt in newsfeed by a fellow Facebook contact. The writing prompt was – “Aaj mere khwabon ne fir se saazish ki hai” which was adopted in the theme of the present poetry and the poetry was composed/created.

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